جوهر فتّاحي - إلى روح الغائب..

سيمضي الزّمن..
مثلما مضت منه أعوام وسنون..
وستبقى دائما هناك..
كما أنت.. كما كنت..
وسنلتقي يوما ما..
في مكان ما..
ما بين نهاية صيف..
وبداية خريف..
في الشّهر الثّامن..
أو الشّهر التّاسع..
شهرا ميلادك ورحيلك..
في يوم كمثل ذلك اليوم الحزين..
كان ذاك اليوم عند العرب..
قديما جدّا..
يسمّى عَروبة..
ثم أصبح فجأة..
يسمّى يوم النّحس..
أو لنقل يوم الرّمس..
كنّا قاب قوسين من أن نلتقي..
ولكن فيه إفترقنا..
ونودي للصّلاة..
كانت صلاة من نوع آخر..
صلاة رتيبة.. ثقيلة.. حزينة..
صلاة الجمر..
والألم..
على غائب لن يعود..
أين ذهب؟ لا أحد يدري!
ولكنّه أراد أن يمضي..
وقُضيت الصّلاة..
ولكن لم ننتشر في الأرض..
بقينا نتأمّل التّراب تارة..
وطورا نتأمّل السّماء..
ننتظر رجعا..
وننتظر صدعا..
فقد يخرج من الصّدع شيء ما..
إنّها سخريّة القدر!
لقد قيل لنا إنّ السّماء ذات رجع..
وإنّ الأرض ذات صدع..
ولكن شيئا من ذلك لم يكن..
ومضى الوقت..
وكبرنا نحن..
ولم تكبر أنت..
وجاوزت أنا الأربعين..
ولم تجاوز أنت الستّة والعشرين..
للأسف..!
لم يسعفك أيلول..
لنمضي معا إلى تشرين..
أيلول كان أسودَ..
كاتما.. للأنفاس..
كعادته.. قاتما..
تبّا لأيلول..!
كلّ المصائب تحلّ في أيلول!
هل كبرنا لنفترق؟..
ليتنا تنبّهنا لغدر أيلول..
وبقينا صغارا..
ولم تفترق..

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